स्तर 3: मानसिक स्तर (Psychology) — “अस्तित्व का भटकाव” का आंतरिक संसार
• स्मृति और कल्पना का ताना-बाना: इस मानसिक धरातल का पूरा वजूद मनुष्य की संचित स्मृतियों (Memory) और भविष्य की कल्पनाओं (Imagination) पर टिका है। मन का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, यह पूरी तरह भूतकाल और भविष्य काल के धागों से बुना गया एक ताना-बाना है।
• मन का अनियंत्रित भटकाव: मन निरंतर अतीत की सुखद-दुखद यादों, काल्पनिक भयों, अकेलेपन, पुरानी आत्मग्लानि (Guilt) और भविष्य की गहरी चिंता (Anxiety) में भटकता रहता है। मन की सबसे बड़ी विकृति और परेशानी यही है कि यह कभी भी ‘अभी’ यानी वर्तमान क्षण में नहीं ठहरता।
• विचारों का दमन और खौफ: अज्ञानता वश लोग मन में उठने वाले अवांछित विचारों को जबरदस्ती दबाने (Suppress) की कोशिश करते हैं। प्रकृति का नियम है कि आप जिस विचार को दबाएंगे, वह अवचेतन में जाकर और अधिक शक्तिशाली व खौफनाक होकर लौटता है। यही कारण है कि इंसान हर समय मानसिक कोलाहल से घिरा रहता है और उसका मन कभी शांत नहीं होता।
• द्रष्टा भाव: इस स्तर का परम रूपांतरण तब होता है जब मनुष्य यह समझ जाता है कि विचारों को बलपूर्वक रोकना पूरी तरह असंभव है। इसलिए विचारों से लड़ने या भागने के बजाय, एक साक्षी (Witness) की तरह उन्हें केवल तटस्थ होकर देखें। जैसे ही आप विचारों के ‘कर्ता’ बनने के बजाय केवल ‘द्रष्टा’ बनते हैं, विचारों का वेग स्वतः ही शांत होने लगता है और मन अगाध शीतलता से भर जाता है।