सांस (Breath/Prana)
सांस का बाहरी रूप हवा का नासिका से अंदर आना और बाहर जाना है, और इसका आंतरिक रूप उस सांस के साथ चलने वाले हमारे विचार, मानसिक शांति और प्राण शक्ति (Prana Energy) हैं।
सकारात्मक सांस: सजग, गहरी और शांत सांस (Positive Impact)
जब मनुष्य बिना किसी हड़बड़ाहट या मानसिक तनाव के, पूरी सजगता के साथ गहरी और लंबी सांस लेता और छोड़ता है, तो उसका प्रभाव संपूर्ण अस्तित्व पर इस प्रकार पड़ता है:
• बाहरी व आंतरिक स्वरूप: फेफड़ों को पूरी तरह ऊर्जा से भरने वाली धीमी, गहरी और लयबद्ध सांस इसका बाहरी रूप है, तथा उसके साथ मन में उमड़ता हुआ शांति और कृतज्ञता का भाव इसका आंतरिक रूप है।
• भौतिक काया पर प्रभाव: गहरी सांस लेते ही शरीर का Parasympathetic Nervous System (परानुकंपी तंत्रिका तंत्र) सक्रिय हो जाता है। यह तुरंत Cortisol (तनाव हार्मोन) के स्तर को न्यूनतम कर देता है। रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, दिल की धड़कन और रक्तचाप (BP) सामान्य होता है, जिससे पूरे भौतिक शरीर को गहरी शीतलता और आरोग्यता मिलती है।
• प्राणिक स्तर पर प्रभाव: ऊर्जा शरीर सीधे सांसों के माध्यम से ही संचालित होता है। सजग सांसों से शरीर की बहत्तर हजार (72,000) नाड़ियों का शुद्धिकरण होता है। रीढ़ की हड्डी में स्थित सभी ऊर्जा केंद्र (चक्र) संतुलित होते हैं, जिससे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (Immunity System) सुदृढ़ होती है और जीवनी शक्ति मजबूत होती है।
• मानसिक कोष पर प्रभाव: सांस और मन का सीधा संबंध है (जैसा मन, वैसी सांस)। जब सांस गहरी और शांत होती है, तो मन में उठने वाले विचारों के तूफान थम जाते हैं। दूसरों से तुलना करने की बेचैनी, ईर्ष्या और क्रोध का रस पूरी तरह विलीन हो जाता है। मन एक शांत तालाब की तरह स्थिर और एकाग्र (Peace of Mind) हो जाता है।
• विवेक की जागृति: शांत सांसों के कारण मस्तिष्क के अग्र भाग (Prefrontal Cortex) को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है, जिससे बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण और स्थिर होती है। मनुष्य का उच्च विवेक जाग्रत होता है और वह किसी भी परिस्थिति में विचलित हुए बिना, सही और गलत का स्पष्ट निर्णय ले पाता है।
• आनंद का अवतरण: जब सांसें पूरी तरह ध्यानमग्न हो जाती हैं, तो सांसों की गति अत्यंत सूक्ष्म हो जाती है। यह अवस्था सीधे आनंदमय कोष का मार्ग खोलती है, जहाँ व्यक्ति ब्रह्मांडीय ऊर्जा और अपनी चेतना के परम आनंद में डूब जाता है।
• अमूल्य धरोहर (चिरस्थायी याद): ध्यान या प्राणायाम के दौरान अनुभव की गई उस परम शांत सांस की अवस्था और उसका जो गहरा सुकून होता है, उसे इंसान जीवनभर कभी नहीं भूलता। वह दिव्य शांति अवचेतन मन की सबसे अनमोल पूंजी बन जाती है।
नकारात्मक सांस: अशांत, उथली और तेज सांस (Negative Impact)
जब मनुष्य अहंकार, क्रोध, डर, लालच या वासना के वशीभूत होकर जीता है, तो उसकी सांसों का पूरा तंत्र अंदर और बाहर से विकृत हो जाता है:
• बाहरी व आंतरिक स्वरूप: छाती से ली जाने वाली अधूरी, तेज, उथली और कांपती हुई सांस इसका बाहरी रूप है, तथा उसके साथ भीतर चल रहा तीव्र गुस्सा, असुरक्षा, चिंता या भय इसका आंतरिक रूप है।
• भौतिक काया पर प्रभाव: ऐसी अशांत सांस शरीर में तुरंत Cortisol और Adrenaline (फाइट-या-फ्लाइट हार्मोन) का भयंकर सैलाब ला देती है। दिल की धड़कन अनियंत्रित हो जाती है, रक्तचाप तेजी से बढ़ता है और तंत्रिका तंत्र गहरे तनाव (Shock) में आ जाता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने से यह शरीर को दिल की बीमारियों और असमय बुढ़ापे की ओर धकेलता है।
• प्राणिक स्तर पर प्रभाव: उथली और तेज सांसों के कारण शरीर को पर्याप्त प्राण वायु नहीं मिल पाती। इससे हमारी जीवनी शक्ति (Life Force) का बहुत तेजी से क्षरण (Drain) होता है। ऊर्जा का यह प्रवाह अशांत होकर चक्रों को असंतुलित और ब्लॉक कर देता है, जिससे व्यक्ति हमेशा थका हुआ, भारी और कमजोर महसूस करता है।
• मानसिक कोष पर प्रभाव: अशांत सांसें मनोमय कोष में नकारात्मक विचारों की गति को दस गुना बढ़ा देती हैं। मन में हर समय तुलना, असुरक्षा, भारी एंग्जायटी (Anxiety) और अवसाद (Depression) का माहौल बना रहता है। व्यक्ति चाहकर भी अपने विचारों की अंधी दौड़ को शांत नहीं कर पाता।
• विवेक का लोप: जब सांसें उखड़ी हुई होती हैं, तो बुद्धि पर भ्रम और अज्ञान का पर्दा पड़ जाता है, जिससे मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है। गुस्से या घबराहट के आवेग में इंसान बिना सोचे-समझे ऐसे आत्मघाती कदम उठा लेता है या ऐसी कटु बातें बोल देता है, जिससे उसके रिश्ते और जीवन दोनों तबाह हो जाते हैं।
• आनंद का अवरोध: अशांत सांसों के कारण चेतना केवल शरीर और विकारों के निचले धरातल पर ही भटकती रहती है। आनंदमय कोष का द्वार पूरी तरह बंद हो जाता है। ऐसा व्यक्ति दुनिया की नजरों में कितना भी सफल क्यों न दिख रहा हो, वह भीतर से हमेशा घोर अशांति, अकेलेपन और आत्मग्लानि (Guilt) की आग में जलता रहता है।
• स्थायी घाव (चिरस्थायी आघात): किसी गहरे डर, सदमे, शोक या अपमान के समय उखड़ी हुई सांसों का जो दर्दनाक अनुभव होता है, उसे इंसान जीवनभर कभी नहीं भूल पाता। वह आघात (Trauma) अवचेतन मन में एक गहरे घाव की तरह बैठ जाता है, जो सालों बाद भी उस परिस्थिति को याद करने पर सांसों को दोबारा अशांत कर देता है।