वासना व मोह (Lust/Attachment)
• चेतना का बंधन: वासना और मोह मनुष्य की चेतना को पूरी तरह से केवल शरीर के धरातल पर बांधकर नीचे की ओर गिरा देते हैं।
• शारीरिक सुख की सीमा: यह किसी व्यक्ति, वस्तु या क्षणिक शारीरिक सुख में ही अपनी जीवन की पूरी खुशी मान लेने का अज्ञान है।
• चेतना का पतन: इसके प्रभाव से आनंदमय कोष का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाता है। चेतना नीचे की ओर गिर जाती है, जिससे व्यक्ति क्षणिक (Temporary) सुखों के जाल में भटकता रहता है और अंत में घोर अंधकार व गहरे अकेलेपन का अनुभव करता है।
• बुद्धि का संकुचन: बुद्धि केवल शारीरिक आकर्षण, संकुचित स्वार्थ और अपनी इंद्रियों की भूख मिटाने के विचारों में चौबीस घंटे डूबी रहती है।
• विवेक का लोप: विवेक पूरी तरह नष्ट हो जाता है और बुद्धि भ्रमित हो जाती है, जिससे मनुष्य सही-गलत, मर्यादा, आत्म-सम्मान और चरित्र का बोध खो बैठता है तथा केवल पशुवत व्यवहार करने लगता है।
• मानसिक विकृति: मन में हर समय कामुक विचार, किसी वस्तु या व्यक्ति को पाने का पागलपन, उसे खोने का डर और दूसरों से खुद की तुलना करने की विकृत सोच पनपती रहती है।
• तीव्र मानसिक अशांति: मन कभी स्थिर नहीं रह पाता। वासना की इच्छा पूरी न होने पर तीव्र क्रोध, हताशा और ईर्ष्या का जन्म होता है, जिससे मस्तिष्क में तनाव रसायनों (Cortisol) का जहर लगातार घुलता रहता है और मानसिक शांति पूरी तरह समाप्त हो जाती है।
• प्राण और चक्रों पर प्रभाव: प्राण ऊर्जा लगातार नीचे के ऊर्जा केंद्रों की ओर बहने लगती है, जिससे सांसें हमेशा भारी, उथली और वासना के वेग से अशांत चलती हैं। इसके प्रभाव से स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra) और मूलाधार चक्र (Root Chakra) अत्यधिक उग्र, असंतुलित और ब्लॉक हो जाते हैं, जिससे मनुष्य की जीवनी शक्ति (Life Force) का तीव्रता से क्षरण (Drain) होता है।