अहंकार (Ego)

अहंकार (Ego)

• परम सत्य की दीवार: अहंकार ही वह मुख्य दीवार है जो मनुष्य की आत्मा को परम सत्य और ब्रह्मांडीय ऊर्जा से अलग करती है।

• विशिष्टता का भ्रम: यह खुद को ब्रह्मांड से अलग एक विशिष्ट और बड़ा अस्तित्व मानना तथा दूसरों को अपने से छोटा या तुच्छ समझने का मानसिक विकार है।

• चेतना का संकुचन: यह ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव आनंदमय कोष के द्वार पर सबसे बड़ा ताला लगा देता है। व्यक्ति का ऊर्जा क्षेत्र (Aura) पूरी तरह से संकुचित और कड़ा (Rigid) हो जाता है, जिससे वह ब्रह्मांडीय चेतना से पूरी तरह कट जाता है।

• वैचारिक हठ: अपनी राय, ज्ञान, धन या पद को ही अंतिम सत्य मानना और दूसरों के उचित एवं सत्य विचारों को भी स्वीकार न करने का हठ।

• विवेक का अंधापन: बुद्धि पर अज्ञान का सबसे मोटा पर्दा पड़ जाता है और विवेक पूरी तरह अंधा हो जाता है। मनुष्य केवल अपनी प्रशंसा सुनने का आदी हो जाता है, जिससे उसका सही-गलत का बोध पूरी तरह नष्ट हो जाता है।

• श्रेष्ठता की बीमारी: मन में हर समय खुद को सही साबित करने की जिद, अपमान का डर, और दूसरों से श्रेष्ठ दिखने की एक आत्मघाती मानसिक बीमारी पनपती रहती है।

• प्रतिशोध की आग: मन एक पल के लिए भी शांत नहीं रह पाता। कोई थोड़ी सी भी आलोचना या बुराई कर दे, तो मन प्रतिशोध की आग में जलने लगता है। मस्तिष्क में लगातार तनाव रसायनों (Cortisol) का स्राव होता है, जिससे मानसिक शांति पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो जाती है।

• प्राण और श्वसन पर प्रभाव: अहंकार के कारण ऊर्जा शरीर में नाड़ियाँ अकड़ जाती हैं और प्राण का प्रवाह अत्यंत भारी व अवरुद्ध हो जाता है। इसके प्रभाव से सांसें हमेशा भारी, रुकी-रुकी और मानसिक तनाव से भरी चलती हैं।

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