चेतना (Consciousness) का संकुचन

चेतना (Consciousness) का संकुचन

चेतना का ऊपर की परतों (आनंद और विवेक) से पूरी तरह गिरकर केवल सबसे नीचे की परतों (वासना, भोजन और पदार्थ) में फँस जाना। जब मनुष्य शरीर के स्तर पर जीने लगता है, तो विनाश का चक्र शुरू होता है।

1. आत्मिक चेतना: जीवन का सुप्त होना (Spiritual Death)

• परम चेतना, प्रकृति और अपनी मूल चेतना से पूरी तरह भटक जाना। यह मान लेना कि “केवल भौतिक सुख और पैसा ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है।”

• मनुष्य के भीतर से करुणा, प्रेम और दया पूरी तरह समाप्त हो जाती है। चेतना पर पाप और स्वार्थ का ऐसा मैल चढ़ जाता है कि इंसान पूरी तरह संवेदनहीन (Numb) हो जाता है। सिर्फ शरीर और पदार्थ के स्तर पर जीने वाला यह मनुष्य बाहर से जीवित दिखता है, पर आध्यात्मिक रूप से मृत होता है। यही कारण है कि इंसान आज चारों तरफ केवल विनाश और नफरत फैला रहा है।

2. विवेक शरीर: बुद्धि का पूरी तरह भ्रष्ट होना (Deluded Intellect)

• सत्य का पूरी तरह तिरस्कार करना और एक-दूसरे को ठगने के लिए झूठ पर झूठ बोलना। चालाकी को ही ‘बुद्धिमत्ता’ मान लेना।

• विवेक पूरी तरह नष्ट हो जाता है। जब बुद्धि भ्रमित होती है, तो मनुष्य खुद अपनी ही बर्बादी को अपनी ‘तरक्की’ (Progress) समझने लगता है।

3. मानसिक शरीर: अवचेतन मन का नरक बनना (Mental Chaos)

• चौबीस घंटे अश्लीलता, हिंसा, और दूसरों से खुद की अस्वस्थ तुलना करने का ज़हर (Low Vibrations) दिमाग में घोलना।

• मनुष्य का मनोमय कोष विक्षिप्त हो चुका है। मनुष्य में एंग्जायटी, भारी डिप्रेशन, अनिद्रा और अकेलेपन का तांडव है। मस्तिष्क में Cortisol (तनाव हार्मोन) का स्तर इतना बढ़ चुका है कि लोग छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हैं। मानसिक शांति (Peace of Mind) पूरी तरह लुप्त हो चुकी है।

4. ऊर्जा शरीर: प्राण शक्ति का क्षरण और दूषित आभामंडल• कुसंगति, तामसिक आहार (नशा/मांसाहार), अशांत और उखड़ी हुई सांसें।

• मनुष्य की जीवनी शक्ति (Life Force) पूरी तरह निचोड़ दी गई है। रीढ़ की हड्डी के नीचे के चक्र (मूलाधार और स्वाधिष्ठान) अत्यधिक उग्र हैं और हृदय का ऊर्जा केंद्र पूरी तरह पत्थर बन चुका है। इंसानों का आभामंडल (Aura) इतना ज़हरीला हो चुका है कि वह पूरी पृथ्वी के वातावरण को अशांत कर रहा है।

5. भौतिक शरीर व प्रकृति: महा-विनाश का अंतिम धरातल (The End Times)

• ऊपर के चारों कोषों (आनंद, विवेक, मन, प्राण) में जो विनाशकारी और ज़हरीली ऊर्जा मनुष्य ने पैदा की थी, उसका पदार्थ (Matter) के धरातल पर उतरना।

• मानव शरीर असाध्य और अजीबोगरीब बीमारियों का घर बन गया है। दवाइयाँ बेअसर हो रही हैं।

• मनुष्य जब प्रकृति को नष्ट करता है, तो प्रकृति उसका करारा जवाब देती है। ग्लोबल वार्मिंग, महामारियाँ, अकाल, बाढ़ और तीसरे विश्व युद्ध का खतरा—यह सब और कुछ नहीं, बल्कि मनुष्य की सोई हुई चेतना का भौतिक परिणाम (Physical Effect) है। इंसान अपनी सोई चेतना से खुद को मिटाने पर तुला है।

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